सब पुश्त दर पुश्त तू ही खुदा, है टेक जमानों की,
तू है और रहेगा सदा, उम्मेद इन्सानों की ।

तूफान जब जोर से आते हैं, जब हमें लगे डर,
हम तुझ में पनाह पाते हैं, तू है हमारा घर ।

हम तेरे पंखों के तले, सब खतरों से हैं दूर,
हाथ तेरा हमें ले चले, यह हम को है मंजूर ।

पहाड़ भी जब न बने थे, न थी जमीन मौजूद,
तू है खुदावन्द अजल से, तू वाजिब उल वजूद ।

तेरे यहां जमानों का, निराला है हिसाब,
और जीना हम इन्सानों का, है ऐसा जैसा ख्वाब ।

वक्त्त जैसे बहता पानी है, सब को बहाता है,
इन्सान जमीन पर फानी है, जल्द चला जाता है ।

सब पुश्त दर पुश्त तू ही खुदा, है टेक जमानों की,
तू है और रहेगा सदा, पनाह इन्सानों की ।