परमेश्वर शरणस्थान और बल हमारा है; (2)
सहायक संकट में, जो सहज से मिलता है (2)

इस लिये कुछ डर नहीं है, चाहे पृथ्वी उलट जाए; (2)
और सब पर्वत चाहे डोल कर (2) बीच समुंद्र गिर भी जाए ।

चाहे गरजे भी समुन्द्र, उसके जल सब फेनाए; (2)
और उसके बढ़ जाने ही से, (2) सब पहाड़ भी कांप उठे ।

नदी एक है जिस की धाराएं, ईश्वर ही के नगर में; (2)
जिस का प्रभु है यहोवा, (2) सत्य आनन्द को देता है ।

है परमेश्वर उस के बीच में, वह न कभी टलेगा; (2)
पौ फटते ही प्रभु उस की, (2) नित्य सहायता करेगा ।

जाति जाति गरज उठे, लगे डगमगाने लोग;(2)
प्रभु जब बोल उठे, पृथ्वी (2) है तब पिघल जाने योग्य ।

सेनाओं का जो यहोवा, संग हमारे सदा है; (2)
याकूब के अनन्त परमेश्वर, (2) ऊंचा गढ़ हमारा हैं ।