हे पिता स्वर्गीय हमारे, आप ही का ध्यान हो,
मन में हमारे प्रेम सागर, आप ही का ज्ञान हो ।

जल में थल में फैल जावे कीर्ति उज्ज्वल आप की, (2)
आप की गूंजे दूदम्भी, आपका सम्मान हो । (2)

राज होवे आप का और आप के फरमान हो, (2)
हम प्रजा हैं आप की, हम आप पर बलिदान हों । (2)

स्वर्ग में जैसे कि इच्छा पूरी होती आपकी, (2)
भूलोक में भी स्वर्ग का सा राग हो और तान हो । (2)

हे अन्न दाता, विश्व पालक, नित्य भोजन दीजिये, (2)
तृप्त कर दो आत्मा को, देह का कल्याण हो । (2)

क्षमा जैसे कर रहे हैं, बैरियों को शत्रु जो, (2)
हम पतित हैं हे प्रभु, हम को क्षमा का दान दो । (2)

दुष्ट से हम को बचाकर, पाप पर जय दीजिये (2)
हम तो हैं निर्बल भिखारी, आप शक्त्तिमान हो । (2)

राज्य तो है आपका, सामर्थ महिमा सर्वदा, (2)
आप हैं त्रिलोक स्वामी, आप ही का मान हो । (2)